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मुग़ल काल : एक सामान्य परिचय तथा बाबर, हुमायूँ एवं शेरशाह सूरी के बारे में विस्तृत Notes {MedHisL5ThaP1}

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मुग़ल साम्राज्य का एक सामान्य परिचय (A general Introduction of the Mughal Empire)

दिल्ली सल्तनत के अंतिम शासक इब्राहिम लोदी को 21 अप्रैल 1526 ई. को पानीपत की प्रथम लड़ाई में हराने के बाद मुग़ल वंश की स्थापना 1526 ई. में बाबर द्वारा की गई थी , बाबर और उत्तरवर्ती मुग़ल शासक तुर्क एवं सुन्नी मुसलमान थे , बाबर के पिता चागताई तुर्क और माता मंगोल वंश से सम्बन्ध रखती थी। लेकिन बाबर ने अपनी आत्मकथा में स्वयं को अपनी माँ के वंश से मानने पर जोर दिया है। इसलिए उसके द्वारा स्थापित वंश मुग़ल वंश कहलाया। वैसे तो मुग़ल वंश में कई शासक हुए लेकिन प्रथम के छः शासक (बाबर , हुमायूँ , अकबर , जहाँगीर , शाहजहाँ , औरंगजेब ) महत्वपूर्ण थे , इनके शासनकाल में मुग़ल वंश काफी फला-फुला और सांस्कृतिक , प्रशासनिक और राजनितिक रूप से ऊंचाइयों पर पंहुचा , अगर क्षेत्रीय विस्तार की बात करे तो मुग़ल साम्राज्य औरंगजेब की शासनकाल में यह अपने सबसे बड़े भू-भाग तक पहुंच गया था। आर्थिक समृद्धि के मामले में अकबर और शाहजहाँ के समय भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। लेकिन औरंगजेब के मृत्यु के बाद आने वाले शासक कमजोर,आयोग्य और विलासी थे जो इतने बड़े साम्राज्य को संभालने में विफल थे।

मुग़ल वंश के शासक (Rulers of the Mughal Dynasty)

शासक पूरानाम शासनकाल जन्म
बाबर जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर 1526-1530 ई.14 February 1483
हुमायूँ नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ 1530-1540ई. ,1555-56 ई.6 march 1508
अकबर जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर 1556 – 1605 ई.14 oct 1542
जहांगीर नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर 1605-1627 ई.20 sep 1569
शाहजहाँ शिहाबुद्दीन मुहम्मद शाहजहाँ 1627-1658 ई.5 jan 1592
औरंगजेब अबुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब 1658-1707 ई.4 Nov 1618
बहादुर शाह प्रथम कुतुबुद्दीन मुहम्मद मुअज्जम शाह आलम 1707-1712 ई.14 oct 1643
जहाँदार शाह मुइज़ुद्दीन जहाँदार शाह बहादुर 1712-1713 ई.9 may 1661
फर्रुखसियर अब्बुल मुजफ़्फ़रुद्दीन मुहम्मद शाह फर्रुखसियर 1713-1719 ई.20 Aug 1685
मुहम्मद शाह रोशन अख्तर बहादुर 1719-1748 ई.17 Aug 1702
अहमदशाहअहमद शाह बहादुर 1748-1754 ई.23 Dec 1725
आलमगीर द्वितीय अजीज-उद-दीन 1754-1759 ई.6 June 1699
शाहआलम द्वितीय मुहम्मद अली गौहर शाह आलम द्वितीय1759-1806 ई.25 June 1728
अकबर द्वितीय अबू नासिर मुइनुद्दीन मुहम्मद अकबर शाह द्वितीय 1806-1837 ई.22 April 1760
बहादुर शाह जफर मिर्ज़ा अबू जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह 1837-1857 ई.24 Oct 1775

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (1526-1530ई.) (Zahir-ud-din Muhammad Babur)

  • जन्म – 14 फरवरी 1483 ई.
  • पूरानाम – जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर
  • उपाधि – पादशाह , कलंदर , गाजी
  • जन्म भूमि – अंदीजान , फरगना घाटी (वर्त्तमान उज्बेकिस्तान में )
  • माता – कुतलुगनिगार खानम
  • पिता – उमर शेख मिर्ज़ा
  • पुत्र – हुमायूँ , हिंदाल ,अस्करी , कामरान
  • राज्याभिषेक – 8 जून 1494 ई. (फरगाना)
  • बाबर के समय दरबारी भाषा – फ़ारसी (लेकिन बाबर व्यक्तिगत रूप से तुर्की भाषा का उपयोग करता था )
  • रचना – तुजुक-ए-बाबरी या बाबरनामा
  • मृत्यु स्थान – आगरा

मुग़ल वंश का संस्थापक बाबर को माना जाता है। बाबर का वास्तविक नाम ‘जहीरुद्दीन मुहम्मद ‘ था।

तुर्की भाषा में बाबर का अर्थ बाघ होता है। अतः जहीरुद्दीन मुहम्मद अपने पराक्रम एवं निर्भिक्ता के कारण बाबर कहलाया।

बाबर का जन्म 14 फरवरी, 1483 को फरगना के एक छोटे से राज्य में हुआ जो अब उज्बेकिस्तान में है। इसके पिता उमर शेख मिर्ज़ा (तैमूर वंशज) तथा माता कुतलुग निगार खानम, जो चंगेज खां की वंशज मंगोल परिवार से ताल्लुक रखती थी। इसलिए इसे तुर्कों एवं मंगोलो दोनों के रक्त का मिश्रण का वंशज कहा गया।

बाबर अपनी दादी ऐसान दौलत बेगम के सहयोग से 11-12 वर्ष की आयु में 1494 ई. में फरगना का शासक बना और मिर्ज़ा की उपाधि धारण किया।

बाबर ने 1501 ई. में समरकंद जीत लिया, किन्तु यह जीत केवल आठ महीने ही रही। बाबर ने काबुल और गजनी पर भी अधिकार कर लिया।

1507 ई. में इसने ‘मिर्ज़ा’ की उपाधि त्याग किया और ‘पादशाह’ (बादशाह) की उपाधि धारण किया।

1519 ई. में बाबर ने पहला बाजौर अभियान किया था। उसी आक्रमण में ही उसने भेड़ा के किला को जीत लिया। बाबर ने इस किले को जीतने के लिए सर्वप्रथम बारूद और तोप का प्रयोग किया।

बाबर पानीपत के प्रथम युद्ध से पहले भारत पर 4 बार आक्रमण किया था।

पानीपत का प्रथम युद्ध उसका भारत पर 5वां आक्रमण था।

पानीपत के प्रथम युद्ध के लिए बाबर को निमंत्रण पंजाब का सूवेदार दौलत खां लोदी और इब्राहिम लोदी के चाचा (आलम खां लोदी) तथा राणासांगा ने दिया था।

पानीपत के प्रथम युद्ध 1526 ई. में बाबर ने उजबेकों की युद्ध नीति तुगलमा निति (अर्धचन्द्राकार) तथा तोपों को सजाने में उस्मानी विधि (रूमी विधि) का प्रयोग किया और इब्राहिम लोदी को पराजित कर दिया और इस युद्ध में इब्राहिम लोदी मारा गया।

दिल्ली सल्तनत का एक मात्र शासक इब्राहिम लोदी ही था, जो युद्ध में मारा गया था।

भारत में तोप (कैनन) का प्रयोग पहली बार बाबर ने ही किया था।

पानीपत के युद्ध में बाबर के तोपखाने का नेतृत्व उस्ताद अली और मुस्तफा खां नामक दो तुर्क अधिकारीयों ने किया।

बाबर का पसंदीदा शहर काबुल था।

पानीपत के प्रथम युद्ध के बाद बाबर ने काबुल के प्रत्येक निवासी को एक-एक चांदी का सिक्का दिया और कलंदर (दानी) उपाधि धारण किया।

पानीपत का प्रथम युद्ध में बाबर ने यह निर्णय नहीं किया था कि वह भारत में स्थायी रूप से रहेगा।

जैसे ही बाबर ने भारत में रहने का योजना बनाया तो राणासांगा ने विरोध कर दिया। 1527 ई. में खानवा (आगरा के समीप) का युद्ध हो गया। इस युद्ध में राणासांगा के साथ इब्राहिम लोदी के भाई महमूद लोदी , आलम लोदी और चंदेरी के राजा मेदनी राय थे। सबकी सेना आगरा आयी और उसके बाद संयुक्त सेना खानवा के मैदान में आ गयी। बाबर का मुकाबला इन चारों से था। इनकी संयुक्त सेनाओं का मुकाबला बाबर के बस की नहीं थी। बाबर ने अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और सैनिकों पर लगने वाले तमगा नामक टैक्स को खत्म कर दिया। बाबर को हर हाल में यह युद्ध जीतना था।

इसी युद्ध में बाबर ने जिहाद शब्द (धर्म के लिए जनादेश) का प्रयोग किया । इस युद्ध में बाबर अपने सैनिकों को मदिरा पिने से रोक लगा दिया। बाबर की सेना पूरी बहादुरी से लड़ी और इस युद्ध में बाबर की जीत हुई। इस युद्ध के बाद बाबर ने गाजी (युद्ध का विजेता) की उपाधि धारण कर लिया।

इसी युद्ध के बाद बाबर ने यह निर्णय लिया की वह भारत में स्थायी रूप से रहेगा।

1528 के चंदेरी (मध्यप्रदेश का ग्वालियर क्षेत्र) के युद्ध में उसने मेदनी राय को पराजित किया।

1529 ई. में उसने घाघरा के युद्ध में बिहार तथा अफ़ग़ान के संयुक्त सेना को पराजित कर दिया। इसका नेतृत्व महमूद लोदी ने किया था। किन्तु बाबर ने अफ़ग़ानों का पूर्णतः सफाया नहीं किया। यही बचे हुए अफगान सैनिक हुमायूँ के लिए खतरा बनकर सामने आए।

बाबर ने चार बाग़ शैली आगरा के आरामबाग नामक बगीचा में बनवाया था। इसमें नदी तथा नहरों द्वारा पानी देने की व्यवस्था थी।

बाबर को चारबाग़ शैली का जनक कहा जाता है।

बाबर ने मुबइयान नामक एक पद्य शैली का विकास किया।

बाबर ने सड़कों को नापने के लिए गज-ए-बाबरी नामक माप का प्रयोग किया था।

बाबर ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया था। इसी मस्जिद का वास्तुकार मीर बाकी था।

बाबर ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-बाबरी (तुर्की भाषा) में यह कहता है कि उसने जिस वक्त भारत पर आक्रमण किया उस वक्त भारत में 5 मुस्लिम राज्य तथा 2 हिन्दू राज्य थे, मुस्लिम राज्य में दिल्ली , मालवा , गुजरात , बहमनी तथा बंगाल था। हिन्दू राज्य में मेवाड़ तथा विजयनगर था।

विजयनगर शासक कृष्ण देवराय बाबर के समकालीन थे बाबर ने इन्हें उस वक्त का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है।

Remark- तुजुक- ए-बाबरी बाबर की आत्मकथा है , जो तुर्की भाषा में है। अब्दुल रहीम खान-ए- खाना ने अकबर के कहने पर इसका फारसी में अनुवाद किया। इसकी फ़ारसी अनुवाद ही बाबरनामा कहलाता है।

बाबर के 4 पुत्र थे। जिसमें सबसे बड़ा पुत्र हुमायूँ था। बाबर अपने जीवन काल में ही हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया था।

बाबर की मृत्यु (Death of Babur)

बाबर की मृत्यु 26 दिसंबर,1530 ई. को 47 वर्ष की उम्र में आगरा में हुई थी , सबसे पहले बाबर को आगरा के आराम बाग़ में दफनाया गया था। बाद अकबर के समय उसके अवशेषों को काबुल (अफ़ग़ानिस्तान) ले जाया गया और वहां ‘बाग़-ए-बाबर’ में स्थायी रूप से दफनाया गया।

बाबर के द्वारा लड़े गये प्रमुख युद्ध (Major battles fought by Babur)

युद्ध सन्विरुद्ध विजेता महत्वपूर्ण बिंदु
पानीपत (हरियाणा) का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल 1526 ई.इब्राहिम लोदी बाबर भारत में इसी युद्ध में पहली बार तोपों और बारूद का संगठित उपयोग हुआ था।
खानवा (राजस्थान) का युद्ध 16 या 17 मार्च 1527 ई.राणा सांगा बाबर खानवा के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद बाबर ने ‘गाजी (धर्म योद्धा)’ की उपाधि धारण की।
चंदेरी (मध्यप्रदेश) का युद्ध 29 जनवरी 1528 ई.मेदिनी राय बाबर इस युद्ध में भविष्य का शासक शेरशाह सूरी बाबर की सेना की ओर से एक सैनिक के रूप में लड़ा था।
घाघरा (गंगा और घाघरा नदी का संगम, बिहार) का युद्ध 6 मई 1529 ई.अफगानों से बाबर यह मध्यकालीन भारतीय इतिहास का पहला ऐसा युद्ध था जो जमीन और पानी दोनों पर एक साथ लड़ा गया था।

बाबर द्वारा लड़े गए युद्ध याद करने का ट्रिक(Trick) :- पानीपत , खानवा , चंदेरी और घाघर 1530 ई. में मर गया बाबर

:- 26 को पानी पिया , 27 को खाना खाया , 28 को चला , 29 को घर पंहुचा ,30 को मर गया।

नसीरुद्दीन मोहम्मद हुमायूँ (1530-1556 ई.)

जन्म – 6 मार्च 1508 ई.

जन्म स्थान – काबुल

मृत्यु – 27 जनवरी 1556 ई. पुस्तकालय (सेरमण्डल) की सीढ़ियों से गिरने से

मृत्युस्थान – दिल्ली

माता – माहम बेगम

पिता – बाबर

राज्याभिषेक- 30 दिसम्बर 1530 ई. (आगरा)

पुत्र – अकबर , मुहम्मद हाकिम , फारुख-फल मिर्ज़ा , अल-अमान मिर्ज़ा

वास्तुशिल्प कार्य – दिल्ली में दीनपनाह (पुराना किला) और उसमें स्थित सेरमण्डल (पुस्तकालय/वेधशाला) शामिल है।

हुमायूँ का जन्म काबुल में माहम बेगम के गर्भ से हुआ था। हुमायूँ का अर्थ होता है – भाग्यवान

यह बाबर के 4 बेटों में से सबसे बड़ा पुत्र था।

बाबर के कहने पर हुमायूँ ने अपने राज्य को 4 भाइयों में बांट दिया था कामरान को काबुल एवं कंधार , अस्करी को संभल तथा हिन्दाल को मेवात (अलवर) की जागीर दी तथा चचेरे भाई सुलेमान मिर्ज़ा को बदख्शां राज्य प्रदान की। जो हुमायूँ की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ।

हुमायूँ का राज्याभिषेक 1530 ई. में हुआ। यह शासक बनने से पूर्व बदख्शां (अफगान) का सूबेदार था।

हुमायूँ का प्रारंभिक शासन शांतिपूर्ण था। किन्तु हुमायूँ के प्रमुख विरोधी थे-एक गुजरात का शासक बहादुर शाह तथा एक बिहार का शासक शेरशाह सूरी।

हुमायूँ ने सर्वप्रथम पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर के साथ हिस्सा लिया था , यह उसके जीवन का प्रथम युद्ध था।

चितौड़ की रानी ,कर्णावती ने गुजरात के शासक बहादुर शाह के अत्याचार से बचने के लिए हुमायूँ से मदद मांगी और भेंट स्वरुप उसे राखी दिया।

हुमायूँ ,कर्णावती की रक्षा के लिए सेना लेकर चल दिया किन्तु कालिंजर के शासक प्रताप रूद्र देव से हुमायूँ का युद्ध हो गया और हुमायूँ के पहुंचने में देर हो गयी तब तक रानी कर्णावती जौहर कर चुकी थी।

हुमायूँ बहादुर शाह को पराजित करने के लिए 1531ई. में सर्वप्रथम कालिंजर अभियान किया।

कालिंजर अभियान हुमायूँ का शासक बनने के बाद पहला अभियान था।

हुमायूँ का अफगानों के विरुद्ध पहला अभियान 1532 ई. में दोहरिया (दौराह) का अभियान था। जिसमें हुमायूँ विजयी रहा।

1538 ई. में हुमायूँ ने गौड़ (बंगाल) अभियान किया। इसने बंगाल का नाम जन्नताबाद रखा।

बंगाल अभियान से लौटते समय उसकी सेना पर शेरशाह सूरी ने 1539 ई. में अचानक चुनार की किला के पास चौसा नामक स्थान पर हुमायूँ पर आक्रमण कर दिया। हुमायूँ की सेना में भगदड़ मच गयी और पराजय की स्थिति में हुमायूँ घोड़ा सहित गंगा नहीं में कूद गया। हुमायूँ की जान शिहाबुद्दीन निजाम नामक भिस्ती (मल्लाह) ने बचायी इसी कारण उसने शिहाबुद्दीन निजाम को एक दिन के लिए दिल्ली का शासक बनाया। इसी ने अपने एक दिन के कार्यकाल में चमड़े का सिक्का चलाया था।

हुमायूँ के जीवन पर आधारित पुस्तक ‘हुमायूँनामा’ की रचना फारसी भाषा में अकबर के अनुरोध पर हुमायूँ की बहन (अकबर की बुआ) गुलबदन बेगम ने किया था, यह पुस्तक दो भागों में है प्रथम भाग में बाबर तथा द्वितीय भाग में हुमायूँ की चर्चा है , यह मुग़लकाल की एकमात्र पुस्तक है जिसकी रचना एक महिला ने की थी।

1540 ई. में शेरशाह सूरी ने बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में हुमायूँ को हराया और उसे भारत छोड़ने पर विवश कर दिया और 1540 ई. में शेरशाह सूरी ने खुद को दिल्ली का शासक घोषित कर दिया।

भारत से निष्कासन के दौरान हुमायूँ ने अपनी गर्भवती पत्नी हामिदा बानों बेगम को अमरकोट (पंजाब) के राजा वीरसाल के दरबार में छोड़कर चला गया।

इन्ही के दरबार में 15 अक्टूबर 1542ई. को अकबर का जन्म हुआ।

निर्वासन के दौरान हुमायूँ काबुल में रहा। हुमायूँ ने पुनः 1545ई. में ईरान के शासक की सहायता से कंधार एवं काबुल पर अधिकार कर लिया।

1553 ई. में शेरशाह के उत्तराधिकारी इस्लामशाह की मृत्यु के बाद अफगान साम्राज्य विघटित होने लगा अतः ऐसी स्थति में हुमायूँ को पुनः अपने राज्य प्राप्ति का अवसर मिला।

1555 ई. में लुधियाना के समीप मच्छीवाड़ा के युद्ध में हुमायूँ ने अफगान सरदार हैवत खान तथा तातार खान को पराजित करके पंजाब जीत लिया।

1555 ई. में ही सरहिंद के युद्ध (चंडीगढ़) में हुमायूँ के सेनापति बैरम खाँ ने अफगान सेनापति सिकन्दरशाह सूरी को पराजित कर दिया।

सरहिंद विजय के पश्चात 1555 ई. में एक बार पुनः दिल्ली के तख़्त पर हुमायूँ को बैठने का सौभाग्य मिला।

हुमायूँ अफीम के सेवन का आदि था। यह ज्योतिष विद्या में विश्वास रखता था , जिस कारण सप्ताह के प्रत्येक दिन अलग-अलग रंग के वस्त्र पहनता था।

हुमायूँ के दरबार में दो प्रमुख चित्रकार मीर सैय्यद अली तथा अब्दुल समद रहते थे।

लेनपूल ने लिखा है , हुमायूँ का अर्थ होता है खुशनसीब व्यक्ति लेकिन हुमायूँ जीवनभर लड़खड़ाते रहा और लड़खड़ाते हुए ही उसकी मृत्यु हो गयी।

हुमायूँ की कब्र ईरानी संस्कृति से प्रभावित है , जिसका वास्तुकार मिर्ज़ा ग्यास बेग था। यह उसकी पत्नी हमीदाबानो बेगम की हुमायूँ को अमूल्य भेंट थी। यह मकबरा दिल्ली में स्थित है।

हुमायूँ द्वारा लड़े गये प्रमुख युद्ध (Major battles fought by Humayun) :-

युद्ध सन्विरुद्ध
कलिंजर का युद्ध 1531ई.प्रताप रूद्रदेव
देवरा/दौराह का युद्ध 1532ई.महमूद लोदी (अफगान)
चुनार का प्रथम घेरा 1532ई.शेरशाह (शेर खां)
बहादुर शाह से संघर्ष 1535-36ई.बहादुर शाह
चौसा का युद्ध जून 1539ई.शेरशाह (शेर खां)
कन्नौज/बिलग्राम का युद्ध मई 1540ई.शेरशाह (शेर खां)
मच्छीवाड़ा का युद्ध मई 1555ई.अफगान सरदार नसीब खां
सरहिंद का युद्ध जून 1555ई.सुल्तान सिकंदर शूरी (अफगानी)

सूरी वंश (Suri Dynasty) (1540-1555ई.) :-

शेरशाह सूरी SherShah Suri (1540-1545ई.)

जन्म – 1472ई.

पिता – हसन खान सूरी

जन्म स्थान – सासाराम (बिहार)

प्रारंभिक नाम – फरीद खां

राज्याभिषेक – 17 मई 1540ई. दिल्ली

उपाधि -सुल्तान-ए-आदिल , हजरत-ए-आला , फरीद-अल-दीन

पुत्र – आदिल खान , जलाल खान (इस्लाम शाह)

मृत्यु – 22 मई 1545ई.

आत्मकथा – तारीख-ए-शेरशाही (अब्बास खान सरवानी द्वारा लिखा गया )

सूर सम्राज्य का संस्थापक अफगान वंशीय शेरशाह सूरी था।

शेरशाह सूरी का बचपन का नाम फरीद खान था। इसके पिता हसन खान थे , जो बिहार के सासाराम क्षेत्र में एक जागीरदार थे और बहलोल लोदी के दरबार में कार्यरत थे।

हसन अली के मृत्यु के बाद शेरशाह सूरी बिहार के बहार खां लोहानी शासक के दरबार में काम करने लगे।

फरीद खां ने एक शेर को तलवार के एक ही वार में मार दिया था उसकी इस बहादुरी से प्रसन्न होकर बिहार के अफगान सुल्तान बहार खां लोहानी ने ही फरीद खां को शेर खां की उपाधि दिया था।

शेरशाह सूरी को द्वितीय अफगान वंश का संस्थापक कहा जाता है।

1538ई. के बंगाल अभियान के बाद हुमायूँ जब लौट रहा था। तो 1539 ई.में चौसा नामक स्थान पर शेरशाह ने आक्रमण कर दिया और हुमायूँ को पराजित किया। 1540 ई. के बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में हुमायूँ को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया और 1540 ई. में दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

शेर खां ने 1539 ई. में चौसा के युद्ध में हुमायूँ को हराने के बाद ‘शेरशाह ‘ की उपाधि धारण की थी।

1541ई. में शेरशाह सूरी का गक्खर जाति के लोगों से युद्ध हुआ , जिसमें शेरशाह उनकी शक्ति को ख़त्म तो न कर सका पर उनकी रोकथाम के लिए उसने पश्चिमोत्तर सीमा पर रोहतासगढ़ के किले का निर्माण करवाया। गक्खर लोग अपनी वीरता एवं साहस हेतु प्रसिद्ध थे , एवं लूटपाट करते थे।

शेरशाह ने 1542ई. में मालवा पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया।

1543 ई.में शेरशाह ने रायसीना पर आक्रमण किया। माना जाता है कि शेरशाह ने इस अभियान में धोखे से राजपूत शासक पूरनमल को मार डाला।

1544 ई. में शेरशाह सूरी ने मेवाड़ अभियान किया और यहाँ के शासक मालदेव को पराजित किया। मेवाड़ विजय कठिन होने के कारण शेरशाह सूरी ने कहा कि मैं एक मुट्ठी बाजरे के लिए पुरे भारत को खो चुका था।

शेरशाह का अंतिम सैन्य अभियान बुंदेलखंड के कालिंजर किले के विरुद्ध था , जिसके शासक राजा कीरत सिंह थे युद्ध के दौरान शेरशाह ‘उक्का’ नामक आग्नेय अस्त्र चला रहे थे। उनके द्वारा फेंका गया एक गोला किले की दीवार से टकराकर वापस वहीं गिर गया जहां बारूद का ढेर रखा हुआ था। विस्फोट के कारण शेरशाह बुरी तरह से झुलस गए और उनकी मृत्यु हो गई। उनके शव को बिहार के सासाराम में दफनाया गया है।

मलिक मोहम्मद जायसी शेरशाह के समकालीन थे।

प्रसिद्ध पुरातत्वविद अलेक्जेंडर कनिंघम ने सासाराम स्थित शेरशाह के मकबरे की तुलना ताजमहल से की है , और इसकी भव्यता के कारण इसे ताजमहल से भी बेहतर बताया है।

शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका छोटा बेटा जलाल खान गद्दी पर बैठा , जिसने इस्लाम शाह सूरी (जिसे सलीम शाह सूरी भी कहा जाता है ) की उपाधि धारण की। लेकिन 1553 ई. में इसकी आकस्मिक मृत्यु हो गई।

इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद उसका 12 वर्षीय पुत्र फिरोज शाह गद्दी पर बैठा। लेकिन मात्र तीन दिन बाद ही उसके मामा मुबारिज खान ने उसकी हत्या कर दी।

शेरशाह सूरी के बाद कोई भी योग्य शासक नहीं बना और इस वंश का अंतिम शासक सिकंदर शाह सूरी था।

शेरशाह सूरी की प्रशासनिक व्यवस्था :-

शेरशाह सूरी ने 1541ई. में पाटलिपुत्र का नाम बदलकर पटना रखा था।

इसने Grand Trank (GT) Road का निर्माण करवाया और उसके किनारे यात्रियों के विश्राम के लिए 1700 सरायों और पानी पीने के लिए कुओं का निर्माण करवाया।

इसने किसानों से सीधा संपर्क स्थापित करने के लिए रैय्यतवाड़ी व्यवस्था शुरू किया। यह किसानों को रैय्यत कहकर बुलाता था।

जब्ती प्रणाली : भूमि की माप के आधार पर लगान तय किया गया। उन्होंने भूमि मापने के लिए ‘गज-ए-सिकंदरी’ का उपयोग किया।

पट्टा और कबूलियत : किसानों को ‘पट्टा’ (सरकारी दस्तावेज) दिया जाता था और बदले में वे ‘कबूलियत पर हस्ताक्षर करते थे। शेरशाह सूरी के राजस्व सुधारों ने बिचौलियों को ख़त्म कर किसानों का सीधा संबंध सरकार से जोड़ा।

शेरशाह सूरी के समय जैनपुर शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था।

शेरशाह सूरी के समय सोने के सिक्के को मोहर ,चांदी के सिक्के को रुपया तथा तांबे के सिक्के को दाम कहा जाता था।

शेरशाह के शासनकाल में चांदी के रुपये एवं तांबे के दाम का अनुपात 1 : 64 था।

शेरशाह ने अपने सिक्के पर अरबी एवं देवनागरी लिपि खुदवाया।

इसने भूमि की जाँच करने के लिए एक कानूनगो नामक अधिकारी की नियुक्ति किया।

शेरशाह के समय पैदावार का लगभग 1/3 भाग सरकार वसूल करती थी।

शेरशाह को अकबर का अग्रदूत भी कहा जाता है , क्योंकि अकबर ने शेरशाह के प्रशासनिक व्यवस्था को अपने शासनकाल में भी लागु किया था।

डाक प्रणाली का प्रचलन शेरशाह द्वारा शुरू की गई थी।

इसने दिल्ली में किला-ए-कुहना नामक मस्जिद का निर्माण कराया।

शेरशाह के समय स्थानीय करों को आवाब कहा जाता था।

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