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भारत के लोक नृत्य(Folk Dance)-List, History, Facts & Tricks {ArtandculL2ThP1}

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लोक नृत्य

भारतीय लोक नृत्य को उनके आयोजन के खास अवसर या नृत्य के मूल स्वरूप के अनुसार निम्न उपश्रेणियों में रखा जा सकता है ……

यह मणिपुर का लोक नृत्य है।

मणिपुर का लाई हरोबा नृत्य माइबी नाम की विशेष प्रकार की पुजारिनों और माइबा नाम के पुजारियों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

यह मैतेई समुदाय द्वारा मंदिरों में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक और धार्मिक त्योहार है। यह सनमाही धर्म के देवताओं उमंग लाई को प्रशन्न करने के लिए किया जाता है।

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यह तमिलनाडु का लोक नृत्य है।

कड़गम का मुख्य नर्तक चावलों और पानी से भरे घड़े को सिर पर संतुलन बनाते हुए रखता है। यह नृत्य गाँव के पवित्र स्थान से शुरू होती है। नर्तकों के पीछे -पीछे लोगों का जत्था जुलूस के रूप में चलता है और वे स्वास्थ्य और वर्षा की देवी मरिअम्मन के मंदिर में जाते है। परंपरा के अनुसार यह नृत्य अगस्त में किया जाता है।

नृत्य के साथ बजाए जाने वाले यंत्रो को नियांदी मेलन कहा जाता है।

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यह सिक्किम की लेपचा जनजाति के लोगों का आनुष्ठानिक नृत्य है।

इसमें तेम्बक (तंत्री वाद्य), टिंडर (ढोल) और रोमू (झाँझ) बजाए जाते है।

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अरुणाचल प्रदेश में सिआंग जिले के गैलो(Galo) जनजातीय समुदाय के लोग समृद्धि की देवी “मोपिन” को प्रसन्न करने के लिए एक त्योहार मनाते हैं, जिसमें मिथुन (इस क्षेत्र का खास जानवर) की बलि चढ़ाई जाती है। बलि के बाद पोपिर नामक नृत्य किया जाता है।

यह नृत्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। पुरुष भी करते है।

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यह मिजोरम का लोकप्रिय नृत्य है।

इसे मिजो जनजाति की लड़कियाँ करती है।

यह एक बांस नृत्य है। इस नृत्य में 6 से 8 पुरुष जमीन पर क्षैतिज रूप से रखे बांस की छड़ियों को पकड़ते हैं, और लयबद्ध तरीके से पीटते हैं, जबकि महिला नर्तक बांस की छड़ियों के अंदर और बाहर कदम रखते हुए नृत्य करती हैं।

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यह केरल का आनुष्ठानिक नृत्य है। इसमें नृत्य करने वाले शिव और पार्वती के विभिन्न अवतारों का रूप धारण करते है।

यह नृत्य झारखंड के संथाल जनजाति के लोग अपने समुदाय के युवाओं को देवी शक्तियाँ प्राप्त करने का प्रशिक्षण देने के लिए करते हैं।

यह एक पूजा नृत्य है, जो बुरी आत्माओं को दूर करने और युवाओं को आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने की कला सिखाने के लिए किया जाता है।

यह नृत्य दशहरे से कुछ दिन पहले किया जाता है।

इस नृत्य के दौरान बजाए जाने वाले संगीत वाद्ययंत्र है :- मदार , एक बेलनाकार ड्रम , नगाड़े , एक गोलार्द्ध सिंगल फेस ड्रम , झाल और झांझ

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यह मणिपुर का लोक नृत्य है। इसकी उत्पति करीब चार शताब्दी पहले वैष्णव संप्रदाय के प्रभाव से हुआ

यह एक धार्मिक लोक नृत्य है, जो वैष्णव संतों के जीवन की कहानी बताता है । इसमें गायन , ढोल और नृत्य के माध्यम से कहानी को प्रस्तुत किया जाता है।

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यह नृत्य असम के नौगॉव जिले में लालुंग जनजाति द्वारा किए जाने वाले नृत्य है। लाँखो का अर्थ है बाँस और फुझा का अर्थ पूजा से है। लालुंग जनजाति के लोग भरपूर फसल के लिए बाँस की पूजा करते है

इसे भूत कोला के नाम से भी जाना जाता है।

कर्नाटक और केरल के तुलु संप्रदाय के लोग यह नृत्य करते है। भूता का मतलब है आत्मा। यह नृत्य चाँदनी वाली रात में किया जाता है।

यह नृत्य एक प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा किया जाता है, जो अस्थाई रूप से एक देवता का रूप धारण कर लेता है। कलाकार आक्रामक तरीके से नृत्य करता है और कई धार्मिक कृत्य करता है तथा भगवान की ओर से लोगों की समस्याओं का जबाब देता है।

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यह नृत्य उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र में किया जाता है।

यह नृत्य देवताओं और स्थानीय देवताओं को उनकी सुप्त अवस्था से जगाने और उनसे अनुग्रह या उपचार मांगने के लिए किया जाता है।

इसमें देवताओं को जगाने के लिए विशेष मंत्रों और गीतों का उपयोग किया जाता है।

यह अनुष्ठान अक्सर किसी बीमारी या संकट से छुटकारा पाने के लिए या किसी विशेष इच्छा को पूरा करने के लिए किया जाता है।

यह उत्तराखंड का लोक नृत्य है।

जागर नृत्य का एक अन्य प्रकार कंचनी नृत्य है। यह नृत्य कृष्ण के एक रूप रमोला की लोक कथा से प्रेरित है।

इस नृत्य को केवल महिलाओं द्वारा किया जाता है।

यह नृत्य अत्यधिक खुशी और आनंद की अनुभूति को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।

यह उड़ीसा एवं झारखंड का लोक नृत्य है।

यह तमिलनाडु का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है। भगवान मुरुगन ( शिवजी के पुत्र, जिन्हें दक्षिण में सुव्रमण्य और उतर भारत में कार्तिकेय के नाम से जाना जाता है।) के मंदिर की यात्रा करने वाले श्रद्धालू कावड़ को कंधे पर रखकर दूध या सुगंधित जल लेकर जाते है। इसी तीर्थ यात्रा के दौरान तीर्थयात्री कांवड़ो को एक कंधे से लेकर दूसरे कंधे पर रखकर कुछ समय तक नृत्य करते हैं।

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यह केरल का प्रसिद्ध लोक नृत्य है।

यह मुख्य रूप से उत्तरी केरल के मालाबार क्षेत्र में किया जाता है।

यह नृत्य 400 से अधिक विभिन्न रूपों में किया जाता है।

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इसे मुडियेडुप्पु के नाम से भी जाना जाता है।

यह देवी काली को प्रसन्न करने के लिए केरल का एक आनुष्ठानिक लोक नृत्य है।

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यह केरल का एक अनुष्ठानिक नृत्य है।

यह नृत्य आमतौर पर भगवती (जो देवी दुर्गा का एक रूप है।) के मंदिर में किया जाता है।

यह नृत्य मंदिर उत्सवों और शरीर से बुरी आत्माओं को दूर भगाने के लिए किया जाता है।

यह गुजरात राज्य में प्रचलित स्त्रियों का लोकनृत्य है।

यह नवरात्रि के अवसर पर आयोजित किया जाता है। इसमें मिट्टी के एक छिद्रयुक्त घड़े में दीपक रखकर उसके चारों ओर गोल घेरा बनाकर तथा माथे पर दीपक युक्त मिट्टी का पात्र रखकर नृत्य किया जाता है।

यह कर्नाटक का एक लोक नृत्य है।

यह नृत्य गाँव के देवता को किसी अनुष्ठान के सिलसिले में कहीं ले जाते समय किया जाता है।

यह नृत्य आंध्र प्रदेश के अनंतपुर और कर्नूल में रहने वाले कुरावा जाति के पुजारियों द्वारा किया जाता है।

इस नृत्य पर शैव सम्प्रदाय का बड़ा असर है, क्योंकि नृत्य के साथ भगवान शिव की स्तुति की जाती है।

यह महाराष्ट्र का एक लोक नृत्य है।

इसे धनगरी गाजा भी कहा जाता है।

धनगर नृत्य केवल पुरुष करते हैं। यह नृत्य धनगर चरवाहों के प्रमुख देवता बीरा देवा के लिए किया जाता है।

यह पारंपरिक नृत्य नवरात्र त्योहार के दसवें दिन बड़े श्रद्धाभाव से किया जाता है।

यह नृत्य झारखंड, बिहार, उड़ीसा एवं छतीसगढ़ में रहने वाले आदिवासी और किसान समुदायों द्वारा किया जाता हैं।

यह नृत्य करम पर्व के दौरान किया जाता है , जो एक फसल उत्सव है और इसका संबंध धान की रोपाई से है।

यह नृत्य मेघालय की जयंतिया जनजाति के लोगों के द्वारा किया जाता है।

यह नृत्य मुख्य रूप से खुशी और एकता का जश्न मनाने के लिए विभिन्न त्योहारों और समारोहों के दौरान किया जाता है।

यह नृत्य मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में अहीर समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है।

इस नृत्य को दिवारी नृत्य के नाम से भी जाना जाता है।

बरेडी/बरेदी नृत्य में दीवारी वास्तव में प्रदर्शन से पहले की कविता है।

यह नृत्य दिवाली से प्रारंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा तक किया जाता है। यह गोवर्धन पूजा से जुड़ा हुआ नृत्य है और कृष्ण के चरवाहा होने की कहानी से प्रेरित है।

यह मध्य प्रदेश के जनजातीय समूह का नृत्य है।

यह नृत्य विशेष रूप से 12 से 16 वर्ष की लड़कियों द्वारा किया जाता है।

यह नृत्य होली और दिवाली जैसे त्योहारों से दो सप्ताह पहले किया जाता है।

यह गोवा का लोक नृत्य है।

यह नृत्य दशहरा और होली के दौरान किया जाता है।

इस नृत्य का अन्य नाम :- छम छम / छनक छम / छम

हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति क्षेत्र के लामा ( बौद्ध भिक्षु ) लोग छम छंक नामक नृत्य करते हैं।

यह नृत्य भगवान बुद्ध की पूजा के लिए बौद्ध समारोहों दे दौरान किया जाता है।

यह पुदुचेरी का नृत्य है। ऐसी मान्यता है कि इस नृत्य की उत्पति रामायण काल में हुई थी। कहा जाता है कि रावण पर राम की विजय की खुशी में वानर सेना ने यह यह नृत्य किया था।

यह अरुणाचल प्रदेश के निशी जनजाति के लोगों का नृत्य है। इसे केवल स्त्रियाँ करती है। इसका उद्देश्य पति के प्रति अपना प्रेम अभिव्यक्त करना और देवताओं के प्रति अपना सम्मान प्रकट करना होता है।

यह नृत्य कर्नाटक के उत्तरी कनारा जिले के हालाकी वोक्कालिंगा समुदाय के कृषक करते हैं।

यह तमिलनाडु के उत्तरी आरकोट जिले में प्रचलित नृत्य है। यह नृत्य माता मरियम के सम्मान में आयोजित किए जाने वाले उत्सव के दौरान किया जाता है।

यह केरल के उरुला जनजातीय समुदाय के लोगों का नृत्य है।

यह भी केरल का एक लोक नृत्य है जिसे मालाप्पुरम जिले के मन्नन समुदाय के लोगों के द्वारा किया जाता है।

यह गुजरात के डांग क्षेत्र का नृत्य है। इस नृत्य का नाम कहाडी नाम के वाद्ययंत्र के नाम पर पड़ा है।

यह हिमाचल प्रदेश का नृत्य है।

यह मिजोरम का नृत्य है। इसे मिजो समुदाय के स्त्री पुरुष करते है।

यह नृत्य राजस्थान में होली के त्योहार के दौरान किया जाता है।

यह मणिपुर के तंगखुल जनजाति का नृत्य है। यह नृत्य दिसंबर में किया जाता है।

यह मेघालय के नोंगटालंग गाँव के 12 जनजातियों के द्वारा किया जाने वाला नृत्य है। बाघ के शिकार करने की खुशी में यह नृत्य किया जाता है।

यह असम का लोक नृत्य है। इसका संबंध धान की खेती से है। धान की बुआई से पहले, धान की पौधे की रोपाई करते समय एवं फसल कटाई के वक्त विहू उत्सव का आयोजन किया जाता है। विहु के तीन उत्सवों में से सबसे रंगारंग और जींवत होता है वहाग विहू। यह वैशाख महीने के पहले दिन मनाया जाता हैकंकली विहू कार्तिक के महीने (सितंबर/अक्टूबर) में आयोजीत किया जाता है एवं भोगली विहू को माघ महीने में (दिसंबर/जनवरी) आयोजीत किया जाता है। इस समय फसल समेटने का काम लगभग पूरा हो चुका होता है।

छत्तीसगढ़ के उरांव जनजाति के लोग सरहुल नृत्य करते हैं।

यह छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के जगदलपुर के आस-पास के घुरुवा जनजाति का नृत्य है।

छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के लोग सैला-रीना नृत्य करते है। नौजवान सैला नृत्य और लड़कियाँ रीना नृत्य करती है।

इस नृत्य को भी छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति के लोग करते हैं।

भोजाली माता (अन्नपूर्णा) के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए उत्सव के दौरान यह नृत्य किया जाता है।

त्रिपुरा के रियांग समुदाय के लोग ह्जागिरी नृत्य काआयोजन करते है। रियांग समुदाय के लोग झूम खेती करते है।

यह भी त्रिपुरा का फसल कटाई का नृत्य है। इसे केवल लड़कियाँ करती हैं।

यह भी त्रिपुरा का फसल कटाई का नृत्य है। इसे केवल लड़कियाँ करती हैं।

यह मणिपुर की कोम जनजाति के फसल कटाई का नृत्य है।

यह सिक्किम के फसल कटाई का नृत्य है जहाँ धान मुख्य फसल है। यह नृत्य स्त्री और पुरुष दोनों करते हैं।

यह अरुणाचल प्रदेश का फसल कटाई का नृत्य है।

ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल में रहने वाले हो जनजातीय समुदाय के लोग धान की बुआई करते समय जो नृत्य करते है उसे डोमरूआ कहा जाता है।

यह मेघालय के हजोग जनजाति का लोक नृत्य है जो फसल कटाई के ठीक पहले होने वाले उत्सव के दौरान किया जाता है। स्त्री और पुरुष दोनों इस नृत्य में शामिल होते हैं।

यह ओडिसा के कोया जनजातियों का नृत्य है।

यह महाराष्ट्र के आदिम जनजाति बर्ली के द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।

यह गुजरात का लोक-नृत्य है।

महाराष्ट्र में रहने वाले धंगर चरवाहा समुदाय के लोगों में यह नृत्य प्रचलित है।

इस नृत्य का प्रचलन तमिलनाडु के मदुरै जिले में है। कामपलटटू नायक्कर समुदाय के पेशेबर नर्तकों की मंडली इस नृत्य को विधिवत करती है। इसे केवल पुरुष करते हैं।

यह लक्ष्यद्वीप का विवाह नृत्य है।

राजस्थान की भील जनजाति के लोग शादी/विवाह के अवसर पर झोरिया नृत्य करते हैं।

राजस्थान के पूर्वी भाग में विवाह के अवसर पर कच्ची घोड़ी नृत्य किया जाता है। आमतौर पर इसे कुम्हार और बाबरिया समुदाय के नर्तक करते हैं। यह नकली घुड़सवारी का नृत्य है।

राजस्थान के माली समुदाय के लोग पुत्र जन्म की ख़ुशी में इस नृत्य को करते हैं। इसे चरवा भी कहा जाता है।

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में विवाह समारोह के समय धोबी समुदाय के लोग कनारा नृत्य करते हैं।

अरूणाचल प्रदेश के आदि जनजाति के विवाह की रस्म को न्यीदा परिक कहा जाता है। विवाह में वधु पक्ष के स्वागत समारोह के अवसर पर पुरुष नर्तकों की दो मंडलियों का नृत्य आयोजित किया जाता है।

अरूणाचल प्रदेश में दफ्ला समुदाय की स्त्रियाँ बच्चे के जन्म पर यह नृत्य करती है।

मध्य प्रदेश की अबुज-मरिया जनजाति के लोग काकसर नृत्य करते हैं। इस नृत्य में लड़के और लड़कियाँ नाचते-नाचते अपना जीवन साथी भी चुन लेते हैं।

यह नृत्य गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के तारनेतर गाँव में लगने वाले मेले में किया जाता है। इस मेले में लड़कियाँ अपना वर चुनती है। पति का वरण कर लेने के बाद लड़के-लड़कियाँ हुडो नृत्य करती है।

यह नृत्य मध्य प्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर, पटालिया और धार इलाके में रहने वाले झील जनजाति के द्वारा किया जाता है। भगोरिया उत्सव के दौरान लड़के एवं लड़कियाँ अपना जीवन साथी चुनते है।

यह उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल का एक सामाजिक नृत्य है। इसमें पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका मिलकर अनेक युगल नृत्य करते हैं।

यह हिमाचल प्रदेश के किऔर जनजाति का नृत्य है।

यह नृत्य मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में प्रचलित है। यह वसंत के आगमन की खुशी में आयोजित किया जाने वाला एक मोर नृत्य है। इस नृत्य को प्रस्तुत करने वाली लड़कियाँ वेदनी कहलाती हैं।

मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में वसंत ऋतु के अवसर पर वाना नृत्य का आयोजन किया जाता है। केवल पुरुष इस नृत्य में भाग लेते हैं। हर नर्तक के हाथों में करीब चार फुट लंबी बांस की एक छड़ी होती है। नृत्य में ढ़ोल मुख्य वाद्य यंत्र होता है।

यह मध्य प्रदेश के कोर्कू जनजाति का नृत्य है। जो वसंत ऋतु के स्वागत में किया जाता है। यह नृत्य केवल पुरुष करते हैं और बच्चे बूढ़े तथा जवान सभी इसमें हिस्सा लेते हैं।

यह उत्तर प्रदेश के बृज क्षेत्र का नृत्य है। असल में चुर्कुला लोहे या लकड़ी का बना वृताकार ढाँचा है जिसमें 108 दीपकों को जलाने की व्यवस्था होती है।

यह उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के संथाल एवं हो जनजातियों का नृत्य है।

झारखंड के छोटानागपुर के उराँव जनजाति इस नृत्य को करती है। इसमें पुरुष और स्त्रियों दोनों भाग लेते है।

यह नृत्य मेघालय के खासी पहाड़ियों में रहने वाले मरिंग समुदाय के लोगो वसंत के आगमन के स्वागत में करते हैं।

ओडिशा के गंजाम जिले के मछुआरा समुदाय के लोग इस नृत्य को करते हैं । यह नकली घोड़े का नृत्य है। ओडिशा में मछुआरा समुदाय को केउता के नाम से जाना जाता है।

यह राजस्थान का लोकनृत्य है जो फाल्गुन (फरवरी/मार्च) के महीने में होली की पूर्णिमा के अवसर पर किया जाता है। इसमें केवल पुरुष भाग लेते है।

यह दोनों नृत्य हरियाणा का है। वसंत ऋतु के अवसर पर लूर नृत्य किया जाता है। यह नृत्य केवल महिलाएँ करती है। होली के अवसर पर सभी उम्र की महिलाओं और पुरुषों द्वारा किया जाने वाला एक अन्य नृत्य है फागुन।

यह नृत्य ओडिशा के संबलपुर और फूलवती जिलों में शरद ऋतु के आगमन के अवसर पर किया जाता है।

ओडिशा के कोराकूट जिले में पारजा जनजातीय समुदाय के लोग यह नृत्य करते हैं । यह पतझड़ ऋतु का नृत्य है।

यह मध्यप्रदेश का लोकनृत्य है। इस नृत्य में स्त्री एवं पुरुष दोनों भाग लेते हैं। नर्तक मंडली का मुखिया बांस का एक डंडा हाथों में उठाए रहता है। जिस पर मोर के पंख बंधे रहते हैं।

यह मध्य प्रदेश के बैगा जनजाति समुदाय का पतझड़ के मौसम का नृत्य है।

झारखंड के उराँव जनजाति के लोग इस नृत्य को करते है।

यह गोवा के कुनाबी जनजाति का पतझड़ मौसम का नृत्य है।

यह अरूणाचल प्रदेश का नृत्य है जिसे आडी जनजातीय समुदाय के लोग करते हैं।

हिमाचल प्रदेश केकिन्नौरी जनजातीय समुदाय के लोग पतझड़ मौसम में इस नृत्य को करते हैं।

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