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भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य (Classical Dance) : भारत के 8 शास्त्रीय नृत्यों की सूची , डिटेल्ड नोट्स ! {ArtandculL1ThP1}

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प्रमुख भारतीय नृत्य बिधाएँ

नृत्य का पहला औपचारिक उल्लेख भरत मुनि की प्रसिद्ध कृति नाट्यशास्त्र (200 ईसापूर्व -200 ईस्वी ) में है ,जिसमें भारतीय शास्त्रीय नृत्य(Classical Dance) के विविध पहलुओं की जानकारी प्राप्त होती है।

प्राचीन काल की भीमबेटका (म .प्र .) शैलाश्रय में सामुदायिक नृत्य संबंधी चित्रकारी

तथा सिन्धु घाटी सभ्यता की खुदाई से प्राप्त काँसे की नृत्यमयी युवती (मोहन जोदड़ो से प्राप्त ) नृत्य के महत्व को दर्शाती है।

नृत्य की आधारभूत मुद्राएँ 108 होती है ,जिनके मेल से किसी विशिष्ट भाव का चित्रण किया जाता है।

शास्त्रीय नृत्य

यह शास्त्रीय नृत्य विधा का सर्वाधिक प्राचीन रूप है।

इसका नाम भरत मूनि तथा नाट्यम शब्द से मिलकर बना है।

तमिलनाडु के अर्काट जिला के चिदम्बरम नगर में भरत नाट्यम का जन्म हुआभरत मुनि इसके आदि आचार्य जाने जाते है।

इस नृत्य का संबंध तमिलनाडु के मंदिरों के देवदासियों की एकल नृत्य प्रस्तुति सादिर (भरतनाट्यम का पुराना नाम) से है, इसलिए इसे दाशी अट्टम भी कहा जाता था।

शास्त्रीय नृत्य

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देवदासी प्रथा के पतन के पश्चात , यह कला लगभग लुप्तप्राय हो गयी थी , जिसे पुनः जीवित करने का श्रेय ई ०. कृष्ण अय्यर को है।

इस नृत्य कला को वैश्विक पहचान दिलाने का श्रेय रुक्मिणी देवी अरुण्डेल को है।

भरतनाट्यम की प्रस्तुतीकरण का आह्वान अलारिप्पु और समापन अवस्था थिल्लन कहलाता है।

भरतनाट्यम को प्रायः अग्नि नृत्य के नाम से भी जाना जाता है।

इस नृत्य की मुख्य मुद्राओं में से एक है ‘कटकामुख हस्त ‘ जिसमें तीन उँगलियों को जोड़कर ऊँ का प्रतीक निर्मित किया जाता है।

नोट :- तंजौर-ए-चतुष्क के नाम से विख्यात तंजावुर के चार शिक्षकों के संरक्षण में भरतनाट्यम को तंजौर नाट्यम के नाम से ख्याति प्राप्त हुई। ये चार शिक्षक थे :- चिंन्नाहया, पोनियाह, वांदिवेलू तथा शिवनन्दम

भरतनाटयम के प्रमुख कलाकार हैं :- यामिनी कृष्णमूर्ति (भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी ), लक्ष्मी विश्वनाथन , पद्मा सुब्रह्मण्यम , मृणालिनी साराभाई , मल्लिका साराभाई ,अलार्मेल वल्ली , वैजयंती माला (भारत का सांसद रह चुकी हैं ) इत्यादि।

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भरतनाट्यम के बारे में विस्तार से जानने के लिए —– Click Here

कुचिपुड़ी नृत्य विधा का नाम आंध्र प्रदेश के एक गाँव कुचेलापुरम से व्युत्पन्न है।

17 वीं शताब्दी में सिध्देद्र योगी ने कुचिपुड़ी नृत्य परंपरा को औपचारिक और व्यवस्थित किया।

कुचिपुड़ी को पुन : जीवित करने का श्रेय बाला सरस्वती एवं रागिनी देवी को है।

20 वीं सदी के प्रारंभ, में लक्ष्मीनारायण शास्त्री ने इसमें एकल गायन और महिला भागीदारी जैसी परिपाटी का शुभारंभ किया।

यह नृत्य सामूहिक रूप से की जाती है।

इसकी प्रस्तुतियों में भागवत पुराण की कहानियों की एवं श्रृंगार रस की प्रधानता होती है।

कुचिपुड़ी नृत्य शैली मानव शरीर में पार्थिव तत्वों को प्रकट करती है।

कुचिपुड़ी की प्रस्तुति में ,नर्तक/नर्तकी स्वयं में ही गायक की भूमिका को भी संयोजित कर सकता/सकती है।

कुचिपुड़ी प्रस्तुति में कर्नाटक संगीत की जुगलबंदी की जाती है। वायलिन तथा मृंदग इसके प्रमुख वाद्य यंत्र होते है। गायन तेलुगू भाषा में होता है।

कुचिपुड़ी नृत्य के प्रमुख कलाकार है : नाटयकला निधि लक्ष्मीनारायण शास्त्री (कुचीपुड़ी की एकल विधा के जनक ) ,बाला सरस्वती ,राधा रेड्ड़ी तथा राजा रेड्ड़ी ,यामिनी कृष्णमूर्ति (भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी ) ,इंद्राणी रहमान इत्यादि।

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कथकली का अर्थ है – एक कथा का नाटक। यह संगीत ,नृत्य और नाटक का अद्भूत संयोजन है।

इस महान नृत्य कला शैली का 300 वर्ष से भी अधिक पहले केरल के तटों पर उद्भव हुआ। 1930 में इसका पुनरुत्थान मलयाली कवि बी . एन . मेनन के द्वारा मुकुंद राजा के संरक्षणा में किया गया।

कथकली के विकास के लिए महाकवि बल्ल्तोल नारायण मेनन द्वारा स्थापित केरल कलामंडलम और अनेक प्रशिक्षण देते है।

  • कथकली आमतौर पर पुरुष मंडली द्वारा किए जाने वाला प्रदर्शन है।
  • कथकली गायन प्रस्तुति में रंगमंच सामग्री का कम -से -कम उपयोग किया जाता है।
  • इस नृत्य में अलग -अलग पात्रों के लिए चेहरे के शृंगार (चेहरे पर रंग लगा कर) के साथ सिर पर टोपी का उपयोग होता है।
  • 1. हरा रंग कुलीनता ,देवत्व और सद्गुण इंगित करता है।
  • 2. नाक की बगल में लाल धब्बे राजसी गौरव इंगित करता है।
  • 3. काले रंग का उपयोग बुराई और दुष्टता को इंगित करने के लिए किया जाता है।
  • 4. पूरी तरह लाल रंग से पुता चेहरा बुराई इंगित करता है।
  • 5. पीला रंग संतों और महिलाओं के लिए होता है।
  • 6. सफेद दाढ़ी उच्चतर चेतना और देवत्व वाले प्राणियों को इंगित करती है।

कथकली में नृत्य और नाटक दोनों सम्मलित है और दोनों इस प्रकार मिले होते है कि उन्हें स्पष्ट रूप से अलग नही किया जा सकता है।

ज्यादातर कथकली गायन अच्छे एवं बुरे के बीच के संघर्ष का निरूपण करता है। इसकी विषय वस्तु ,रामायण ,महाभारत एवं पुराणों में वर्णित कहानियां होती है। इसे पूर्व का गाथागीत भी कहा जाता है।

कथकली गीतों के लिए प्रमुख भाषा मणिप्रवलम अर्थात मलयालम और संस्कृत का मिश्रण है।

इसमें नवरस नामक चेहरे के नौ महत्वपूर्ण भाव अलग -अलग भावनाएँ व्यक्त करने के लिए सिखाए जाते है।

कथकली खुले रंगमंच या मंदिर परिसरों में किया जाता है। प्रकाश के लिए पीतल के दीपक का प्रयोग किया जाता है।

कथकली आकाश (ether) तत्व का प्रतीक है।

प्रसिध्द प्रतिपादक : गुरु कुंचू कुरूप ,गोपीनाथ , कोट्टकल शिवरमण ,रीता गांगुली आदि।

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मोहिनीअट्टम केरल के दो शास्त्रीय नृत्यों में से एक है (दूसरा कथकली है) ।

सभी शास्त्रीय भारतीय नृत्यों की तरह मोहिनीअट्टम नृत्य की जड़े भी नाट्य शास्त्र (लेखक भरतमुनि) में है।

मोहिनीअट्टम मोहिनी शब्द से लिया गया है जो भारतीय पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु का एक प्रसिद्ध नारी अवतार है। जिसका अवतरण देव और असुरों के बीच युद्ध के दौरान हुआ था जब असुरों ने अमृत के ऊपर अपना नियंत्रण कर लिया था। मोहिनी ने वो अमृत असुरों को मोह में लेकर देवताओं को दे दिया था।

मोहिनीअट्टम का नृत्य ,मूल रूप से नृत्यांगनाओं द्वारा किया जाने वाला एकल नृत्य है।

19वीं सदी में त्रावणकोर के शासक स्वाति थिरूनल ने मोहिनअट्टम के संरक्षण में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

अप्रचलित हो जाने के बाद मलयालयी कवि वी. एन. मेनन ने कल्याणी अम्मा के साथ पुनः जीवित किया।

  • मोहिनअट्टम के प्रदर्शनों की सूची अनुक्रम भरटनाटयम के समान है।
  • मोहिनीअटट्म की विषय वस्तु प्रेम तथा भगवान के प्रति समर्पण है। विष्णु या कृष्ण इसमें अधिकांशतः नायक होते है।
  • इसमें नृत्यांगना को केरल की सफेद और सुनहरी किनारी वाली सुंदर कासाबू साड़ी में सजाया जाता है।

मूलभूत नृत्य ताल चार प्रकार के होते है : तगानम , जगानम ,धगानम , सामीश्रम।

मोहिनीअट्टम के प्रदर्शन के माध्यम से वायु तत्व को अभिव्यक्त किया जाता है।

मोहिनीअट्टम में प्रयुक्त किया जाने वाला वाद्ययंत्र है। – वीणा ,ढोल ,बाँसुरी ,झाँझ (हाल के वर्षो में मृंदग एवं वीणा भी शामिल किया गया है। )

प्रसिद्ध कलाकार है : सुनंदा नायर ,कलामंडलम क्षेमवती , माधुरी अम्मा , जयप्रभा मेनन आदि।

ओडिसी ,ओडिशा राज्य की एक शास्त्रीय नृत्य शैली है। इस नृत्य का जन्म मंदिर में नृत्य करने वाली देवदासियों नृत्य से हुआ है।

यह नृत्य शैली संभवतः नाट्यशास्त्र में वर्णिता ओड़ा नृत्य पर आधारित है।

ओडिसी नृत्य का उल्लेख शिलालेखों में मिलता है ,इसे ब्रहोश्दा मंदिर के शिलालेखों में दर्शाया गया है साथ ही कोणार्क के सूर्य मंदिर के शिलालेखों में दर्शाया गया है साथ ही कोणार्क के सूर्य मंदिर के केंद्रीय कक्ष में इसका उल्लेख मिलता है। उदयगिरि- खण्डगिरि की गुफाएँ ओडिसी नृत्य के कुछ प्रारंभिक उदाहरण प्रदान करती है।

मुख रूप से महारियों द्वारा यह नृत्य किया जाता था । महरी शब्द का प्रयोग देवदासी के साथ किया जाता है।

ओडिसी नृत्य को जैन राजा खारवेल का संरक्षण प्राप्त था।

ओडिसी नृत्य भगवान कृष्ण को समर्पित है और इसके छंद संस्कृत नाटक गीत गोविंदम् से लिए गए है।

ओडिसी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण परंपरा गोटीपुआ की है। गोटीपुआ युवा लड़के थे जो अपने परिवारों द्वारा मंदिरों या अखाड़ों को समर्पित थे , जहाँ उन्होंने कलाबाजी ,गायन और नृत्य में प्रशिक्षण लिया था।

गोटीपुआ युवा नर्तक महिलाओं के रूप में कपड़े पहनते है और सखी परंपरा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण के प्रेम और भक्ति के गीतों पर नृत्य करते है।

यह नृत्य मुद्राओं और आसन के उपयोग में भरतनाट्यम के समान है।

यह नृत्य रूप जल तत्व को प्रतीकबद्ध करता है।

इस नृत्य के कुछ प्रमुख प्रतिपादक है : गुरु पंकज चरण दास, गुरु केलूचरण महापात्र, सोनलमान सिंह, शेरॉन लोवेन, आनंदिनी दास इत्यादि।

मणिपुरी नृत्य का नाम इसकी उत्पति स्थल के नाम पर पड़ा है। यह नृत्य मुख्यतः हिन्दू वैष्णव प्रसंगों पर आधारित होता है जिसमें राधा और कृष्ण के प्रेम प्रसंग प्रमुख है। सामान्यतः यह नृत्य नृत्यांगनाओं द्वारा किया जाता है।

18वीं सदी में मणिपुर के राजा भाग चन्द्र ने मणिपुरी नृत्य को पुर्नजीवित करने का प्रयास किया।

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस नृत्य को शांतिनिकेतन (पं. बंगाल) में प्रचलित किया।

1. इस नृत्य में तांडव और लास्य दोनों सम्मिलित है ,लेकिन लास्य पर बल दिया जाता है।

2. राधा कृष्ण की प्रेम कहानी (रास -लीला) इस नृत्य गायन की आवर्ती विषय है।

3. इसमें जयदेव एवं चण्डीदास की रचनाओं का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।

4. इस नृत्य में चेहरा पतले घूँघट से ढँका होता है।

5. इस नृत्य में हाथ के हाव -भाव और पैरों की गति महत्वपूर्ण होती है।

प्रसिद्धि प्रतिपादक : झावेरी बहनें (नयना ,सुवर्णा ,रंजना एवं दर्शना): गुरु बिपिन सिंह ,एन माधवी देवी इत्यादि।

कथक एक उत्तर भारतीय नृत्य है , जो उत्तर -प्रदेश में उत्पन्न हुआ है।

कथक शब्द कथा से आया है जिसका अर्थ कहानी है।

इस नृत्य के तीन प्रमुख घराने है। – 1. जयपुर घराना 2. लखनऊ घराना 3. बनारस घराना (एक कम प्रसिद्ध रायगढ़ घराना भी है

जयपुर घराना : यह भानुजी के द्वारा आंरभ किया गया। इस घराने में प्रवाह, गति तथा लंबे लयबद्ध पैटर्न पर बल दिया जाता है।

लखनऊ घराना : इसमें अभिव्यक्ति तथा लालित्य पर अधिक बल दिया जाता है। यह घराना नबाब वाजिद अली शाह के शासन काल में अपने चरम पर पहुँचा।

बनारस घराना : यह जानकी प्रसाद के संरक्षण में विकसित हुआ। यह समरूपता पर विशेष बल देता है। इसमें फर्श का अधिक प्रयोग होता है।

रायगढ़ घराना : यह राजा चक्रधर सिंह के संरक्षण में विकसित हुआ। यह आघातपूर्ण संगीत पर बल देने के कारण अद्वितीय है।

कथक नृत्य विधा को जटिल पद -चालनों तथा चक्करों के प्रयोग से पहचाना जाता है।

जुगलबंदी कथक प्रस्तुति का मुख्य आकर्षण है, जिसमें तबला वादक तथा नर्तक के बीच प्रतिस्पर्धा होती है। जुगलबंदी सामान्य तौर पर ध्रुपद संगीत के साथ होती है। मुगल काल में तराना, ठुमरी तथा गजल भी इसमें सम्मिलित किए गए थे।

गत भाव बिना किसी गायन के किया नृत्य है। इसका प्रयोग विभिन्न पौराणिक उपाख्यानों को रेखांकित करता है।

पढ़ंत एक विशिष्ट रूपक होता है, जिसमें नर्तक जटिल बोल का पाठ कर नृत्य के द्वारा उनका प्रदर्शन करता है।

प्रसिद्ध प्रतिपादक : बिरजू महाराज, लच्छू महाराज, सितारा देवी, दमयंती जोशी इत्यादि।

यह नृत्य असम का शास्त्रीय नृत्य है। वर्ष 2000 में इस नृत्य को भारत के आठ शास्त्रीय नृत्य में सम्मिलित होने का गौरव प्राप्त हुआ।

भरत मुनि के नाटय शास्त्र में इसका उल्लेख है। यह भक्ति आंदोलन से प्रेरित है। 15वी शताब्दी में वैष्णव संत शंकरदेव द्वारा आधुनिक रूप में सत्रीय नृत्य को प्रचलित किया गया था।

यह नृत्य असम में प्रचलित विभिन्न नृत्य रूपों का मिश्रण है। (खासकर ओजपाली एवं देवदासी का)

सत्रीया गायन में विष्णु की पौराणिक कहानियों का उल्लेख होता है।

भोकोत (भगत) नामक पुरुष भिक्षुओं द्वारा यह नृत्य समूह में किया जाता है।

इस नृत्य के प्रमुख वाद्ययंत्र है – ढोल, मजीरा एवं बाँसुरी।

धोती एवं पगड़ी नर्तकों द्वारा पहना जाने वाला वस्त्र है और रेशम से बनी धुरी और चादर नृत्यांगनाए द्वारा पहनी जाने वाली वस्त्र है।

अंकिया वाट सत्रीय का एक प्रकार है जिसमे संगीतात्मक नाटक सम्मिलित होता है। इसे मूल रूप से असपिया -मैथिली मिश्रित भाषा में लिखा जाता है, जिसे ब्रजबुली कहते है। इसी प्रकार एक और रूप भाओना है। जो भगवान कृष्ण की कहानियों पर आधारित है।

1.भरतनाट्टयम यामिनी कृष्णमूर्ति, सोनल मान सिंह, रुक्मिणी देवी, अरुण्डेल, टी. बाल सरस्वती पद्मा सुब्रह्मण्यम, एस. के. सरोज, रामगोपाल, लीला सैमसन, मृणालिनी साराभाई , वैजयंतीमाला बाली, मालविका सरकार, प्रियदर्शिनी गोविन्द।
2.कुचिपुड़ी यामिनी कृष्णमूर्ति, लक्ष्मी नारायण शास्त्री, राधा रेड्डी, राजा रेड्डी, स्वप्नसुंदरी, वेदांतम सत्यनारायण वेम्पति चेनासत्यम।
3.ओडिसीसंयुक्त पाणिग्रह, सोनल मान सिंह, किरण सहगल, माधवी मुदगल, रानी कर्ण, कालीचरण पटनायक, इंद्राणी रहमान, शोरोन लोवेन (USA) मिर्ता वारवी (अर्जेटीना) नृत्य गुरु : मोहन महापात्र, केलुचरण महापात्र , पंकज चरण दास, हरेकृष्ण बेहरा, मायाधर रावत।
4.कथकली बल्लतोल नारायण मेनन, उदयशंकर, कृष्ण नायर, शांता राव, मृणालिनी साराभाई, आनन्द शिवरामन, कृष्णन कुट्टी आदि।
5.कत्थक बिरजू महाराज, लच्छु महाराज, सुखदेव महाराज, सितारादेवी, गोपीकृष्ण, शोभना नारायण, मालविका सरकार, चंद्रलेखा, बिन्दादीन महाराज, अच्छन महाराज, नारायण प्रसाद।
6.मणिपुरीगुरु अलमी सिंह, आतम्ब सिंह, नलकुमार सिंह, झावेरी बहने (दर्शना, नयना, सुवर्णा तथ रंजना झावेरी) , सविता मेहता, कलावती देवी, चारु माथुर, सोनारिक सिंह, गोपाल सिंह, बिम्बावती।
7.मोहिनीअटट्म कल्याणी अम्मा, भारती शिवाजी, रागिनी देवी, हेमामालिनी, श्रीदेवी, शांताराव, तारा निडीगाडी , गीता गायक आदि।
शास्त्रीय नृत्य

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