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Active Euthanasia और Passive Euthanasia क्या है? और लिविंग विल (Living Will) से आप क्या समझते है?

Active Euthanasia और Passive Euthanasia इन दोनों ही शब्दों का प्रयोग ‘इच्छामृत्यु’ को इंगित करने हेतु किया जाता है, कभी-कभी असाध्य रोग (जिस रोग का ईलाज संभव न हो) होने के कारण मरीज़ को काफी पीड़ा सहना पड़ता है,और गंभीर बीमारी होने के वजह से मरीज़ को लाइफ-सपोर्ट पर जिन्दा रखा जाता है , इस तरह के असहनीय दर्द से जूझरहे, लाइलाज मरीजों को मृत्यु देकर उन्हें पीड़ा से मुक्त करने की दो अलग-अलग प्रक्रिया है, जिसे Active Euthanasia और Passive Euthanasia कहा जाता है। इन दोनों प्रक्रियाओं को लागु करने की दो अलग-अलग विधियां है , Active Euthanasia में मरीज को कोई जहरीला इंजेक्शन देकर अप्राकृतिक रूप से मृत्यु दिया जाता है, यानि कहने का मतलब है की किसी व्यक्ति के मृत्यु का सक्रिय कारण बनाना जो की सामाजिक रूप से ठीक नहीं है , इसीलिए यह भारत में गैरकानूनी है , लेकिन बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे देशों में कुछ शर्तो पर इसे लागु किया जाता है। दूसरा है Passive Euthanasia , इसमें मरीज को कोई जहरीला इंजेक्शन देकर या किसी दवाई का ओवरडोज़ देकर नहीं मारा जाता है बल्कि मरीज को जो बाहर से लाइफ-सपोर्ट दिया जाता है उसे हटा दिया जाता है जिससे मरीज की मृत्यु प्राकृतिक रूप से धीरे-धीरे हो जाती है, यह क़ानूनी और सामाजिक रूप से ठीक है, यह भारत में क़ानूनी रूप से मान्य है।

भारत में क़ानूनी स्थिति :- हाल ही में 24 मार्च 2026 को हरीश राणा का मामला इसका एक चर्चित उदाहरण है , जहाँ 13 साल कोमा में रहने के बाद उन्हें Passive Euthanasia की अनुमति दी गई। लिविंग विल

लिविंग विल (Living Will) क्या है ?

यह एक क़ानूनी दस्तावेज है , जिसमें एक मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति पहले ही लिख सकता है की अगर भविष्य में वह कभी ऐसी लाइलाज बीमरी या कोमा जैसी गंभीर स्थिति में हो और खुद से फैसला लेने में सक्षम न हो और उसके ठीक होने की कोई उम्मीद न हो, तो उसे किसी तरह के कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली पर न रखा जाये। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार ‘ (Right to Die with Dignity) संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to life) का हिस्सा है।

लिविंग विल के लिए कुछ आवश्यक शर्ते :-

व्यक्ति मानसिक रूप से पूरी तरह से स्वस्थ हो।

लिविंग विल बनाने वाले व्यक्ति की उम्र 18 साल या उससे अधिक होनी चाहिए।

यह पूरी तरह से अपनी इच्छा से और बिना किसी दबाव या जबरदस्ती के बनाया जाना चाहिए।

दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उन परिस्थियों का जिक्र हो जब इलाज बंद करना हो।

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