Last Update
रेडियोकार्बन C14 जैसी नवीन विश्लेषण – पद्धति के द्वारा सिंधु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2400 ईशा पूर्व से 1700 ईशा पूर्व मानी गयी है।
इसका विस्तार त्रिभुजाकार है।
सिन्धु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल दाशक नदी के किनारे स्थित सुतकागेंडोर (वलूचिस्तान) ; पूर्वी पुरास्थल हिण्डन नदी के किनारे आलमगीरपुर (जिला मेरठ, उत्तर प्र.) ; उत्तरी पुरास्थल चिनाव नदी के तट पर अखनूर के निकट माँदा (जम्मू कश्मीर) व दक्षिणी पुरास्थल गोदावरी नदी के तट पर दाइमावाद (जिला अहमदनगर, महाराष्ट्र) है।
नोट:- तिथि निर्धारण की कार्बन-14 (6C14) / कार्बन डेटिंग की खोज अमेरिका के प्रसिद्ध रसायन शास्त्री वी. एफ. लिवि के द्वारा 1946 ई में की गयी थी। इस पद्धति में जिस पदार्थ में कार्बन – 14 की मात्रा जीतनी ही कम रहती है, वह उतनी ही प्राचीन मानी जाती है।
जीव की मृत्यु के बाद कार्बन-14 (6C14) का क्षय शुरू हो जाता है और कार्बन-14 (6C14) के क्षय की दर को मापकर जीव की मृत्यु की समय से उसकी अनुमानित आयु ज्ञात की जाती है।
- जीवित जीव में C-12 और C-14 का एक निश्चित अनुपात बना रहता है लेकिन जीव के मृत्यु के बाद C-14 का क्षय होने लगता है।
- C-14 की अर्ध-आयु लगभग 5730 वर्ष होती है। इसका मतलब यह है कि हर 5730 वर्ष में , किसी भी नमूने में C-14 की मात्रा लगभग आधी रह जाती है।
- वैज्ञानिक मृत नमूने में मौजूद C-12 और C-14 के अनुपात को मापते हैं और इसकी तुलना जीवित जीव में होने वाले अनुपात से करते हैं।
- इस तुलना के आधार पर यह गणना की जाती है कि नमूने में कितना कार्बन-14 का क्षय हुआ है और इस प्रकार नमूने के आयु का अनुमान लगाया जाता है।
सिंधु सभ्यता की खोज 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने की।
सर जॉन मार्शल (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन महानिदेशक) ने 1924 ई में सिन्धु घाटी सभ्यता नामक एक उन्नत नगरीय सभ्यता पाए जाने की विधिवत घोषणा की।
सिंधु सभ्यता को आघ ऐतिहासिक (Protohistoric) अथवा कांस्य (Bronze) युग में रखा जा सकता है। इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविण एवं भूमध्यसागरी थे।
सिंधु सभ्यता या सैंधव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी।
सैंधव सभ्यता से प्राप्त परिपक्व अवस्था वाले स्थलों में केवल 6 को ही बड़ी नगर की संज्ञा दी गयी है ; ये है ____मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल, राखीगढ़ी, धौलावीरा एवं कालीबंगन।
Note :- धौलावीरा भारत में सिंधु घाटी सभ्यता की पहली साइट है जिसे यूनस्को ने 2021 में विश्व विरासत स्थल की सूचि में शामिल किया है।
स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गये हैं।
Note :- सिन्धु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल मोहनजोदड़ो है, जबकि भारत में इसका सबसे बड़ा स्थल राखीगढ़ी (घग्घर नदी के किनारे , हरियाणा के हिसार जिला में स्थित है। इसकी खोज 1963 ई में सूरजभान ने की थी।) है।
लोथल एवं सुरकोटदा सिन्धु सभ्यता का बंदरगाह था।
अग्निकुण्ड (यज्ञ वेदी) लोथल एवं कालीबंगन से प्राप्त हुए हैं।
मनके बनाने के कारखाने लोथल एवं चन्हूदड़ो में मिले हैं। मनका एक सजावटी वस्तु होती है, जिसे पिरोकर माला या आभूषण बनाए जाते थे।
सिन्धु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक है। यह लिपि दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी। जब अभिलेख एक से अधिक पंक्तियों का होता था, तो पहली पंक्ति दायीं से बायीं और दूसरी बायीं से दायीं ओर लिखी जाती थी।
नोट :- लेखनकला की उचित प्रणाली विकसित करने वाली पहली सभ्यता सुमेरिया की सभ्यता थी।
सिन्धु सभ्यता के लोगो ने नगरों तथा घरो के विन्यास के लिए ग्रिड पद्धति अपनाई थी। घरों के दरवाजे और खिड़कियाँ सड़क कि ओर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे। केवल लोथल नगर के घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।
सिन्धु सभ्यता में मुख्य फसल थी ⟶ गेहूँ ओर जौ।
सैंधव वासी मिठास के लिए शहद का प्रयोग करते थे।
रंगपुर एवं लोथल से चावल के दाने मिले हैं , जिनसे धान की खेती होने का प्रमाण मिलता है। चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल से ही प्राप्त हुए है।
सुरकोटदा , कालीबंगन एवं लोथल से सैंधवकालीन घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं।
मापन हेतु 16 या उसके गुणकों (16 के अनुपात) का उपयोग किया जाता था। जैसे :- 16 , 64 , 160 , 320 , 640 आदि।
मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलुहा शब्द का अभिप्राय सिन्धु सभ्यता से ही है।
संभवतः हड़प्पा संस्कृति का शासन वणिक वर्ग (व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोग) के हाथों में था।
पिग्गट ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वाँ राजधानी कहा है।
स्वस्तिक चिन्ह संभवतः हड़प्पा सभ्यता की देन है। इस चिन्ह से सूर्योपासना का अनुमान लगाया जाता है।
सिन्धु घाटी के नगरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले है।
सिन्धु सभ्यता में मातृदेवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी।
पशुओं में कुबड़ वाला साँड़ इस सभ्यता के लोगो के लिए विशेष पूजनीय था।
स्त्री मृण्मूर्तियाँ (मिट्टी की मुर्तियाँ) अधिक मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सैंधव समाज मातृसत्तात्मक था।
सैंधववासी सूती एवं ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे।
आग में पकी हुई मिट्टी को टेराकोटा कहा जाता है।
सिन्धु सभ्यता के लोग काले रंग से डिजाइन किये हुए लाल मिट्टी के बर्तन बनाते थे।

सिन्धु घाटी के लोग तलवार से परिचित नहीं थे। क्योंकि वे शांतिप्रिय लोग थे वहाँ से कोई बड़े पैमाने पर युद्ध या रक्षात्मक हथियार नहीं मिले हैं। उनके हथियार मुख्य रूप से बचाव के लिए थे जैसे – भाले और तीर-कमान। इसके अलावा वे लोहा से परिचित नहीं थे और तलवार लोहा से बनता है। वे चाकू से परिचित थे।
पर्दा-प्रथा एवं वेश्यावृति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थी।
शवों को जलाने एवं गाड़ने यानि दोनों प्रथाएँ प्रचलित थी। हड़प्पा में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा विद्यमान थी। लोथल एवं कालीबंगा में युग्म समाधियाँ मिली है।
सैंधव सभ्यता के विनाश का संभवतः सबसे प्रभावी कारण बाढ़ था।
सिंधु घाटी सभ्यता में शिल्प उत्पादन के लिए आवश्यक सीपियाँ मुख्य रूप से नागेश्वर (गुजरात) और बालाकोट (पाकिस्तान) जैसे तटीय क्षेत्रों से प्राप्त की जाती थी।