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परिभाषा : विसरण एवं परासरण {CheL1TheP1}

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विसरण एक ऐसी प्रक्रिया है , जिसमें अणु उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र में जाते हैं , जब तक की सांद्रता समान न हो जय।

यह किसी भी माध्यम (ठोस , तरल या गैस ) में हो सकता है।

विसरण के लिए किसी झिल्ली की आवश्यकता नहीं होती है।

जैसे :-

  1. इत्र की खुशबू का हवा में फैलना।
  2. स्याही की एक बूंद का पानी में फैलना।
  3. गर्म खाने की सुगंध का पुरे कमरे में फैल जाना है।
  4. मलमूत्र की दुर्गन्ध का नाको तक पहुँचना।

तापमान के बढ़ने से विसरण की दर बढ़ जाती है। तथा तापमान के घटने से विसरण की दर घट जाती है।

  • इसका कारण यह है कि तापमान बढ़ने से अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है और वे तेजी से गति करने लगते हैं , जिससे विसरण की दर बढ़ जाती है।
    • जैसे :- ठंडे खाने का सुगंध कम फैलता है जबकि गर्म खाने का सुगंध तेजी से और दूर तक फैल जाता है।

परासरण एक ऐसी प्रक्रिया है , जिसमें विलायक (जैसे -पानी) के अणु एक अर्धपारगम्य झिल्ली के माध्यम से विलयन के निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र से उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र में जाते हैं।

यह केवल तरल माध्यम में होता है।

परासरण के लिए एक अर्धपारगम्य झिल्ली की आवश्यकता होती है।

  • अर्धपारगम्य झिल्ली :- अर्धपारगम्य झिल्ली एक ऐसी झिल्ली होती है जो कुछ अणुओं या आयनों को अपने से होकर गुजरने देती है और कुछ को नहीं गुजरने देती है। अर्थात यह झिल्ली कुछ पदार्थों के लिए पारगम्य होती है और बाकि के लिए पारगम्य नहीं होती है।

जैसे :-

  1. पौधों की जड़ों द्वारा पानी का अवशोषण।
  2. कोशिका झिल्ली के माध्यम से पानी का स्थानांतरण।
  3. किसमिश को जल में डालने पर उसका फूलना।
  4. अंगूर को नमक या चीनी के गाढ़े घोल में डालने पर अंगूर का पिचकना।

तापमान के बढ़ने से परासरण की दर बढ़ जाती है तथा तापमान के घटने से परासरण की दर घट जाती है।

  • इसका कारण यह है कि तापमान बढ़ने से अणुओं की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है और वे तेजी से गति करने लगते हैं तथा पहले की तुलना में अधिक बार अर्धपारगम्य झिल्ली से टकराते हैं, जिससे परासरण की दर बढ़ जाती है।
    • जैसे :- सूखा चना ठंडे पानी की तुलना में गर्म पानी में जल्दी फूल जाता है।

व्युत्क्रम परासरण एक ऐसी प्रक्रिया है , जिसमें विलायक (जैसे -पानी) के अणु को एक अर्धपारगम्य झिल्ली के माध्यम से विलयन के उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर (अर्थात उच्च सांद्रता वाले विलयन से निम्न सांद्रता वाले विलयन की ओर ) , परासरण की सामान्य दिशा के विपरीत प्रवाहित किया जाता है।

इस प्रक्रिया में उच्च सांद्रता वाले विलयन पर एक बाहरी दबाव लागू करके , विलायक को झिल्ली के माध्यम से विपरीत दिशा में धकेला जाता है , जिससे विलायक कम सांद्रता वाले क्षेत्र में चला जाता है।

जैसे :-

  1. समुद्री जल से आसुत जल बनाना।
    • इसमें समुद्री जल पर उच्च दबाव डालकर , पानी को लवणों से अलग किया जाता है।
ठोस , द्रव तथा गैस पर तापमान का प्रभाव

ठोस को द्रव में बदलने की प्रक्रिया को गलन कहते हैं।

जैसे :- बर्फ का पिघलना , मोमबत्ती का पिघलना आदि।

किसी द्रव का ठोस अवस्था में बदलने की क्रिया को जमाव कहते हैं।

जैसे :- पानी का बर्फ बनना , ज्वालामुखी से निकला लावा का ठंडा होकर चट्टान में बदलना आदि।

द्रव को गैस में बदलने की प्रक्रिया को वाष्पन कहते हैं।

जैसे :- धूप में रखे गीले कपड़ों का सूख जाना , खुले बर्तन में रखा पानी का धीरे- धीरे कम होना आदि।

वाष्पन से ठंडक उत्पन्न होती है। :- तरल पदार्थ जब गैसीय अवस्था में बदलता है तो उसे ऊर्जा की आवश्यकता होती है , जो वह अपने आसपास से लेता है, जिससे आसपास का क्षेत्र ठंडा हो जाता है।

  • जैसे :- मिट्टी के घड़े में पानी रखने पर पानी का ठंडा होना , स्पिरिट या ईथर की बूंदों का हथेली पर ठंडक पैदा करना आदि।

गैस से द्रव में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं।

जैसे :- ठंडे गिलास के बाहर पानी की बूंदों का दिखना , सुबह घास पर ओस की बूंदें , कार की खिड़कियों का धुंधला होना आदि।

गैस का द्रवण निम्न ताप एवं उच्च दाब पर सुगमता से संपन्न होता है। अर्थात उच्च दाब तथा निम्न ताप पर गैस आसानी से संघनित हो जाती है।

जब कोई ठोस पदार्थ गर्म करने पर ठोस से सीधे गैस में बदल जाता है, तो ठोस से सीधे गैस में बदलने की प्रक्रिया को उर्ध्वपातन कहते है।

जैसे :- कपूर , आयोडीन , गंधक (सल्फर), नौसादर (NH4Cl), एन्थ्रासीन , बेंजोइक अम्ल , नेफ्थेलीन , आयडोफॉर्म आदि को गर्म करने पर ये ठोस से सीधे गैस में बदल जाते हैं।

गैस को ठंडा करने पर सीधे ठोस में बदलने की प्रक्रिया को निक्षेपण कहते हैं।

जैसे :-

  1. पाला बनना :- ठंडी और नम हवा के कारण जलवाष्प सीधे बर्फ के क्रिस्टल में बदलकर पत्तियों या अन्य सतहों पर जम जाती है।
  2. कालिख का जमा होना :- चिमनी की ठंडी दीवारों पर गर्म गैसों से कालिख के कण सीधे जम जाते हैं।

जिस तापमान पर किसी तरल पदार्थ का वाष्प दाब उस तरल पर लगने वाले वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाता है, उस तापमान को उस पदार्थ का क्वथनांक कहते हैं।

शुद्ध जल का क्वथनांक (समुद्र तल पर / मानक वायुमंडलीय दाब पर) 100°C या 212°F या 373.15K होता है।

क्वथनांक को प्रभावित करने वाले कारक

  1. वायुमंडलीय दाब :- वायुमंडलीय दाब बढ़ने पर क्वथनांक बढ़ता है और वायुमंडलीय दाब घटने पर क्वथनांक घटता है।
    • प्रेशर कुकर में खाना जल्दी पकता है क्योंकि कुकर के अंदर का दबाव बढ़ने से पानी का क्वथनांक 100°C से ऊपर चला जाता है।
  2. समुद्र तल से ऊंचाई :- समुद्र तल से ऊंचाई बढ़ने पर क्वथनांक कम होता है और ऊंचाई घटने पर क्वथनांक बढ़ता है।
    • क्योंकि ऊंचाई बढ़ने पर वायुमंडलीय दाब कम होता जाता है और ऊंचाई घटने पर वायुमंडलीय दाब अधिक होता जाता है।
    • पृथ्वी की सतह के अपेक्षा पहाड़ों पर खुले बर्तन में खाना पकाने में अधिक समय लगता है क्योंकि ऊंचाई बढ़ने पर क्वथनांक कम हो जाता है।
    • प्रेशर कुकर में खाना पकाने पर जितना समय पृथ्वी की सतह पर लगता है उतना ही समय पहाड़ों पर भी लगता है क्योंकि प्रेशर कुकर के अंदर का दबाव प्रत्येक जगह समान रहता है।
  3. विलेय की उपस्थिति (अशुद्धि की उपस्थिति) :- जब किसी तरल पदार्थ में गैर वाष्पशील अशुद्धि मिलाया जाता है , तो उस तरल पदार्थ का क्वथनांक बढ़ जाता है।
    • क्योंकि अशुद्धि के कण तरल की सतह पर विलायक के अणुओं को बाधित करते हैं , जिससे वाष्प दाब कम हो जाता है और वाष्प दाब को वायुमंडलीय दाब के बराबर लाने के लिए अधिक ताप की आवश्यकता होती है।

जिस तापमान पर कोई तरल पदार्थ ठोस अवस्था में परिवर्तित होने लगता है , उस तापमान को उस पदार्थ का हिमांक कहते हैं।

शुद्ध जल का हिमांक (समुद्र तल पर / मानक वायुमंडलीय दाब पर) 0°C या 32°F या 273.15K होता है।

हिमांक को प्रभावित करने वाले कारक

  1. वायुमंडलीय दाब :- जिन पदार्थों का जमने पर आयतन बढ़ता है , दाब बढ़ने पर उन पदार्थों का हिमांक घट जाता है तथा जिन पदार्थों का जमने पर आयतन घटता है , दाब बढ़ने पर उन पदार्थों का हिमांक बढ़ जाता है।
  2. विलेय की उपस्थिति (अशुद्धि की उपस्थिति) :- किसी पदार्थ में अशुद्धि मिलाने पर उनका हिमांक कम हो जाता है।

जिस तापमान पर कोई ठोस पदार्थ पिघलकर द्रव अवस्था में परिवर्तित होने लगता है , उस तापमान को उस पदार्थ का गलनांक कहते हैं।

गलनांक को प्रभावित करने वाले कारक

  1. वायुमंडलीय दाब :- जिन पदार्थों का जमने पर आयतन बढ़ता है , दाब बढ़ने पर उन पदार्थों का गलनांक घट जाता है तथा जिन पदार्थों का जमने पर आयतन घटता है , दाब बढ़ने पर उन पदार्थों का गलनांक बढ़ जाता है।
  2. विलेय की उपस्थिति (अशुद्धि की उपस्थिति) :- किसी पदार्थ में अशुद्धि मिलाने पर उनका गलनांक कम हो जाता है।

4°C पर शुद्ध पानी का आयतन सबसे कम (न्यूनतम) तथा घनत्व सबसे अधिक (अधिकतम) होता है।

जब जल को ठंडा किया जाता है , तो उसका आयतन घटता जाता है तथा घनत्व बढ़ता जाता है और 4°C पर पानी का आयतन सबसे कम (न्यूनतम) तथा घनत्व सबसे अधिक (अधिकतम) हो जाता है लेकिन जब 4°C से निचे ठंढा किया जाता है तो आयतन बढ़ने लगता है और घनत्व घटने लगता है।

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