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मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन : मुद्रास्फीति (Inflation), अवस्फीति अथवा मुद्रा-संकुचन (Deflation) और मुद्रा-अपस्फीति (Disinflation)

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मुद्रा-मूल्य में होने वाले परिवर्तनों के मुख्य चार रूप होते हैं। ……..1. मुद्रास्फीति (Inflation), 2. अवस्फीति अथवा मुद्रा-संकुचन (Deflation), 3. मुद्रा-संस्फीति (Reflation), 4. मुद्रा-अपस्फीति (Disinflation)

मुद्रास्फीति वह स्थिति है जिसमें कीमत स्तर में वृद्धि होती है तथा मुद्रा का मूल्य गिरता है। अर्थात मुद्रा स्फीति वह अवस्था है, जब वस्तुओं की उपलब्ध मात्रा की तुलना में मुद्रा तथा साख की मात्रा में अधिक वृद्धि होती है और परिणामस्वरूप मूल्य स्तर में निरन्तर व महत्वपूर्ण वृद्धि होती है जिससे वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं।

मुद्रास्फीति

भारत में मुद्रा स्फीति थोक मूल्य सूचकांक के द्वारा मापी जाती है।

कीन्स के अनुसार वास्तविक मुद्रा स्फीति पूर्ण रोजगार बिन्दु के बाद ही उतपन्न होती है। पूर्ण रोजगार बिन्दु से पूर्व उतपन्न होने वाली स्फीति आंशिक स्फीति कहलाती है, जो प्रेणात्मक होती है।

मुद्रास्फीति से अभिप्राय बढ़ती हुई कीमतों के क्रम से है, न कि बढ़ी हुई कीमतों की स्थिति से।

1. अत्यधिक मुद्रा निर्गमन (आवश्यक मात्रा से अधिक नोट छापना ) से उतपन्न स्फीति को चलन स्फीति कहते हैं।

2. उदार ऋण नीति (ब्याज दर में कमी ) के फ़लस्वरुप व्यापारिक बैंकों द्वारा अत्यधिक साख निर्गमन के कारण उतपन्न स्फीति को साख स्फीति कहा जाता है।

3. वस्तुओं एवं सेवाओं की तेजी से बढ़ती मांग के फलस्वरूप तेजी से बढ़ती मुद्रा की सक्रियता के कारण बढ़ने वाली कीमतें मांग प्रेरित स्फीति उतपन्न करती हैं।

4. वस्तुओं की उत्पादन लागत बढ़ जाने के कारण जब वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाया जाता है तब इसे लागत प्रेरित स्फीति कहा जाता है।

5. बजट के घाटे को पूरा करने के लिए हिनार्थ प्रबन्धन के अन्तर्गत नये नोटों को छापा जाना मुद्रा की पूर्ति का विस्तार करता है, जिससे कीमतों में वृद्धि होती है। इसे हिनार्थ प्रेरित स्फीति या बजटीय स्फीति कहा जाता है।

6. अवमूल्यन के फलस्वरूप निर्यात बढ़ने तथा देश में आन्तरिक पूर्ति घट जाने से वस्तुओं की कीमतें बढ़ने लगती हैं जिससे अवमूल्यन जनित स्फीति उतपन्न होती है।

1. उत्पादक वर्ग (कृषक, उद्योगपति, व्यापारी) को लाभ होता है, क्योंकि वे Inflation के कारण बेहतर कीमत प्राप्त करते हैं, जिससे उन्हें अधिक मुनाफा होता है।

2. ऋणदाता (लेनदार) को हानि होती है एवं उधारकर्ता (उधार लेनेवाला या ऋणी या देनदार) को लाभ होता है।

3. यह वेतनभोगी और पेंशनभोगी वर्गो को बुरी तरह प्रभावित करती है, क्योंकि Inflation में वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है, जबकि आय में कोई वृद्धि नहीं होती है।

4. निश्चित आय वाले वर्ग को हानि होती है जबकि परिवर्तित आय वाले वर्ग को लाभ होता है।

5. समाज में आर्थिक विषमताएँ बढ़ जाती हैं धनी वर्ग और धनी तथा निर्धन वर्ग और निर्धन होता चला जाता है।

6. व्यापर संतुलन विपक्ष में हो जाता है क्योंकि आयात में वृद्धि तथा निर्यात में कमी हो जाती है।

7. बॉण्ड-धारक को हानि होती है।

  1. हीनार्थ प्रबन्धन
  2. अतिरिक्त मुद्रा निर्गमन
  3. उदार ऋण एवं साख नीति
  4. युद्ध-जनित अनुत्पादक व्यय
  5. प्रतिगामी कराधान नीति
  6. प्रशुल्क एवं व्यापार नीति
  7. कठोर उद्योग नीति

मुद्रास्फीति को विभिन्न उपायों द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। मुद्रास्फीति को आदर्श दरों तक नियंत्रित किया जाता है। (शून्य मुद्रास्फीति दर को कभी पसंद नहीं किया जाता है)

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के किसी भी उपाय का मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति के प्रवाह को कम करना या बाजार में तरलता को कम करना है।

सरकार (RBI नही) मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए राजकोषीय उपायों का प्रयोग करती है। इसके तहत निम्न उपाय किए जाते हैं।

(i) संतुलित बजट बनाना।

(ii) सार्वजनिक व्यय विशेषकर अनुत्पादक व्यय पर नियंत्रण रखना।

(iii) प्रगतिशील करारोपण।

(iv) सार्वजनिक ऋण में वृद्धि करना।

(v) बचत को प्रोत्साहित करना। एवं

(vi) उत्पादन में वृद्धि करना।

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ये उपाय RBI (सरकार नहीं) द्वारा किये जाते हैं, इसमें मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय सम्मिलित है. ….

  • खुला बाजार परिचालन के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियों के विक्रय द्वारा
  • नगद आरक्षित अनुपात (CRR) की वृद्धि द्वारा
  • वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) की वृद्धि द्वारा
  • बैंक दर में वृद्धि द्वारा (जिससे उधार लेना महँगा हो जाता है।)
  • रेपो-दर एवं रिवर्स रेपो-दर में वृद्धि द्वारा
  • सीमांत आवश्यकताएँ
  • नैतिक प्रोत्साहन
  • प्रति चक्रीय राजकोषीय नीति का प्रभावी कार्यान्वयन और अर्थव्यवस्था का सामान्यीकरण।
  • काला-बाजारी और जमाखोरी को रोकना
  • निरुद्ध पदार्थों के निर्यात पर रोक
  • भविष्य में होने वाले निरुद्ध पदार्थों के व्यापार को निलंबित करना।
  • माँग-जनित मुद्रास्फीति की स्थिति में वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति सुलभ कराना।

वह प्रकिया जिसमें जान-बूझकर मुद्रा और साख की मात्रा में वृद्धि करके वस्तु-मूल्यों में वृद्धि का प्रयास किया जाता है, मुद्रा संस्फीति कहलाता है। संस्फीति प्रायः अर्थव्यवस्था में व्याप्त मंदी से छुटकारा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

यह संपूर्ण अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य कीमत स्तरों में हुई कमी है। यदि वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति अधिक है, लेकिन उस स्थिति के समक्ष पर्याप्त मुद्रा आपूर्ति नहीं है, तो अपस्फीति घटित हो सकती है।अर्थात वह स्थिति जिसमें समय के साथ-साथ वस्तु और सेवाओं की कीमतें गिरती हैं,मुद्रा अपस्फीति (Deflation) कहलाती है।

अपस्फीति मुख्य रूप से आपूर्ति और माँग में परिवर्तन के कारण होती है।

अपस्फीति सामान्यतः अधिक बेरोजगारी से संबंधित होती है।

अपस्फीति मुद्रा के मूल्य में वृद्धि करती है।

जब मुद्रा स्फीति ऋणात्मक होती है, तब यह अपस्फीति लाती है।

अपस्फीति निरपवाद रूप से मंदी से जुड़ी है, अर्थात अर्थव्यवस्था में ऋणात्मक संवृद्धि।

अपस्फीति को नियंत्रित करने के लिए मुद्रा आपूर्ति हेतु निम्न उपाय किए जा सकते हैं :-

(i) सरकारी व्यय में वृद्धि

(ii) बैंक दर और रेपो-दर में कमी

(iii) अधिक मुद्रा का मुद्रण

(iv) माँग बढ़ाने के लिए करों में कमी

अवस्फीति समय के साथ मुद्रास्फीति में परिवर्तन की दर को दर्शाती है। अवस्फीति के अंतर्गत मुद्रास्फीति की दर गिरती है और शून्य की तरफ जा सकती है, लेकिन ऋणात्मक कभी नहीं होती, यह घनात्मक ही बनी रहती है।

यह तब घटित होती है, जब कुछ वस्तुओं में मुद्रास्फीति और अन्य में अपस्फीति होती है, जैसे जीवन जीने के खर्च में वृद्धि (मुद्रास्फीति) के साथ परिसंपत्तियों जैसे आवास की कीमतें गिरती (अपस्फीति) है

Stagflation

मुद्रास्फीतिजनित मंदी या स्टैगफ्लेशन तब उत्पन्न होती है, जब मंदी या स्टैगनेशन(Stagnation) (अर्थात शून्य आर्थिक संवृद्धि) और मुद्रास्फीति दोनों एक साथ घटित होती है।

यह अर्थव्यवस्था का ऐसा दौर होता है, जिसमें कोई संवृद्धि नहीं होती है, बेरोजगारी अपेक्षाकृत उच्च होती है, वस्तुओं की कीमत में वृद्धि होती है तथा GDP में गिरावट होती है।

सामान्यतः जब बेरोजगारी आती है, तो व्यय एवं वस्तुओं की कीमत में गिरावट आती है लेकिन स्टैगफ्लेशन एक ऐसी दुर्लभ घटना है जिसमें बेरोजगारी बढ़ने के साथ – साथ वस्तुओं की कीमत भी बढ़ जाती है।

सैम्युलसन के अनुसार निःस्पंद स्फीति एक नई बीमारी है जिसमें वस्तुओं के मूल्यों तथा मजदूरी की दरों में वृद्धि होती है, किन्तु साथ-ही-साथ बेरोजगारी में भी वृद्धि होती है और उत्पादित किया हुआ माल बिकना कठिन हो जाता है।

  • मुद्रा की मात्रा में तेजी से वृद्धि
  • मजदूरी दरों में तीव्र वृद्धि
  • प्राकृतिक प्रकोप
  • विदेशी व्यापार में घाटा
  • उत्पादन लागत में वृद्धि
  • लम्बे समय तक मुद्रास्फीति की स्थिति का बने रहना।

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